Wednesday, April 20, 2016

हमारी सोच कितनी जवान है ???

नमस्कार दोस्तों !!!
                       आधुनिकता की हर चकाचोंद में हमारी सोच कितनी जवान है ?? मुझे तो लगता है हम बस मानसिक गुलामी में जी रहे है , जो परिद्रश्य जीवन हमारे सामने रखता है उसे हम ज्यो का त्यों ही रख लेते है और उसी का अनुसरण  करने लगते है|  जीवन का अर्थ कई मायनों में हम समझ ही नही पाते है , मानसिकता की जंजीरे जहां जीवन का दायरा छोटा कर देती है वंहा जीवन महज किसीके जीवन की परछाई मात्र ही रह जाता  है |
भगवान ने हर किसी को जीवन को देखने परखने की कला दी है पर हम कभी कभी उसका इस्तमाल ही नही करते है |


रोजमर्रा के इस जीवन में कहीं हम जीवन का असली अर्थ ही न भूल जाये , इससे बचने के लिए रोजाना कुछ समय खुद के लिए निकाले| अपनी वर्चुअल लाइफ से थोडा दूर रहे , रोजाना प्रकृति के साथ कुछ वक्त बिताये और यकीं मानिए किसी पब या मौल से कहीं बहतर होता है किसी नदी के किनारे बैठ उस बहते हुवे पाने को देखना और  हाँ वंहा प्रकृति से जुड़ने के लिए किसी वायफाय की जरुरत नही पड़ेगी. धन्यवाद
                                                                                                                    ----संजय जाटव---

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